जीवन व समाज की विद्रुपताओं, विडंबनाओं और विरोधाभासों पर तीखी नजर । यही तीखी नजर हास्य-व्यंग्य रचनाओं के रूप में परिणत हो जाती है । यथा नाम तथा काम की कोशिश की गई है । ये रचनाएं गुदगुदाएंगी भी और मर्म पर चोट कर बहुत कुछ सोचने के लिए विवश भी करेंगी ।

शनिवार, 1 जुलाई 2017

उसको टॉपर ही बनना है

साभार-hazrat-ji-md-shakeel-bin-hanif

एक गधा जिद कर बैठा


जीवन में कुछ करना है,


जो भी हो, उपाय करो


उसको टॉपर ही बनना है ।


                                    मैंने उसको लाख मनाया


                                   बाप बन उसको समझाया,


                                   वह कानों पर हाथ रख बोला


                                   उसको टॉपर ही बनना है ।



साभार-indiatimes.com

बेटा देख कठिन डगर है


लाखों इसमें अगर-मगर है,


अगर है ऐसा, तो फिर पक्का


उसको टॉपर ही बनना है ।


                                 पुस्तक का तो बड़ा महत्व है


                                 इंटरनेट भी नया तत्व है,


                                 हाथों में मोबाइल लेकर


                                उसको टॉपर ही बनना है ।



साभार-indiatimes.com

दिन भर मेहनत का अफसाना


रातों को भी चैन न पाना,


भले आँख में रात कटे


उसको टॉपर ही बनना है ।


                               नहीं गधों का पढ़ना काम


                               समझो फिर शिक्षा तमाम,


                               शिक्षा से क्या लेना-देना


                               उसको टॉपर ही बनना है ।

साभार-bhootworld.com

मैंने पूछा-टॉपर देखा है


झट वह बोला-पूरा लेखा है,


नहीं कभी वे फेल हुए


उसको टॉपर ही बनना है ।


                             तू नहीं समझता तिकड़म सारी


                             गधों को मिलती अक्सर गारी,


                             यही नियति है, हरदम देखा


                             उसको टॉपर ही बनना है ।


मैंने कहा-तू जेल जाएगा

साभार-amarujala.com

वापस कभी न घर आएगा,


ऐसे जेलों की ढेंचू-ढेंचू


उसको टॉपर ही बनना है ।


                              तब गधे को गुस्सा आया


                             रौद्र अपना वह रूप दिखाया,


                             जल मरें चाहे जलने वाले


                             उसको टॉपर ही बनना है ।

सोमवार, 19 जून 2017

चोरलैंड का महा-प्रस्ताव

            



साभार-hindustantimes
   चोरों की महासभा का आयोजन किया गया था । इसमें हर वो बंदा आमंत्रित था, जो कर्म से चोर हो, लेकिन उसकी आत्मा उसे चोर कतई न मानती हो । हर तरह के चोर बुलाए गए थे । नामी चोर भी-बेनामी चोर भी, विख्यात चोर भी-कुख्यात चोर भी, धनी चोर भी-गरीब चोर भी, बड़ा चोर भी-छोटा चोर भी, रसूखदार चोर भी-आम चोर भी, शहरी चोर भी-देहाती चोर भी, पहलवान चोर भी-निर्बल चोर भी, इंटरनेशनल चोर भी-नेशनल चोर भी, रोटीखोर चोर भी-चाराखोर चोर भी, नेता भी-पुलिस भी । कोई भी किस्म निमंत्रण के दायरे से बाहर नहीं थी ।
   अनुमान के विपरीत सारी कुर्सियां भर गई थीं । इधर-उधर खाली जगहों पर इतने लोग खड़े थे कि तिल रखने की भी जगह नहीं थी । मंच जो विशेष चोरों के लिए बना था, वह भी आंशिक रूप से अतिक्रमण का शिकार हो चुका था । यह सभी के लिए आश्चर्य का नहीं, बल्कि संतोष व गौरव का विषय था कि दुनिया में चोर ही चोर हो गए हैं । संख्या की अधिकता कई अधिकारों की मांग भी करती है ।
   तभी मंच पर विशेष चोरों का आगमन हुआ था । सबसे आगे महासभा का आयोजक चल रहा था । किसी को भी उसकी अगुवाई में चलने पर कोई एतराज नहीं था, बल्कि फख्र ही हुआ था । आयोजक कई बार जेल की यात्रा करके अपनी प्रतिभा को बहुत पहले ही साबित कर चुका था । चोर लोहा मानते थे उसकी कलाकारी का । चोरी एक उच्च कोटि की कला है और विरले चोर ही कला की उस ऊँचाई को छू पाते हैं ।
   बिना एक पल की देरी किए आयोजक माइक के सामने आ खड़ा हुआ था । अपनी तोंद पर हाथ फेरने के बाद उसने कहना शुरु किया, भाइयों और भाइयों ! हम क्षमा माँगता हूँ अपना संबोधन के लिए । हम बहन नहीं बोल सकता हूँ, काहे से कि हम उन लोगन को न्योतना भूल गया हूँ । खैर, अगली सभा में हम बुला लूँगा । हाँ तो बात इ है कि एकदम्मे से समय पलटा खा गया है । उ हमरी मुट्ठी से रेत का माफिक निकलता जा रहा है । हम लोगन का तुरंत एक्शन में आने की जरूरत है ।’
   ‘बात कुछ समझ में नहीं आई ।’ भीड़ में से आवाज उभरी थी ।
   ‘चोरी तो पहले भी होता था, पर सरकार भली थी । बहुते बवाल होने पर ही वह एक्शन में आती थी । जनता के बहुते दबाव पर दो-चार महीने की जेल भी हो जाती थी । पर मेहनत का पइसा चोर के पास ही बना रहता था ।’
   ‘हाँ तो अब क्या समस्या है?’ दूसरे कोने से किसी ने पूछा था ।
   ‘बहुते बड़ी समस्या है ।’ आयोजक बोला, ‘नई सरकार खांटी फासीवादी है । उ तो हमरा ही पइसा छीनने पर तुली हुई है । जमीन-जायदादो पर उसकी नजर है । कुछ नहीं किया गया, तो बहुते जल्दी हम सब के हाथ में कटोरा होगा । फिर गाते फिरो फिल्मी गाना-गरीबों की सुनो वो तुम्हारी सुनेगा, तुम एक पइसा दोगे वो दस लाख देगा...’
साभार-TeluguOne.com
   ‘तो हमें करना क्या है?’ इस बार मंच से ही एक चोर उठा था ।
   ‘अपना मुल्क बनाना है...चोरलैंड ! अऊर कउनो चारा नहीं है ।’
   ‘यह तो बहुत ही बढ़िया बात है । वहाँ सब चोर ही चोर होंगे ।’ मंच पर एक नेता खुशी से उछल पड़ा था ।
   ‘बुड़बक कहीं का ।’ आयोजक झिड़कते हुए बोला, ‘अइसा भी कहीं होता है का? बेईमान डॉक्टर होगा, तो तुम्हरे ही पेट में छूरा छोड़ देगा । इंजीनियर बेईमान हुआ, तो हम लोगन के सिर पर ही बिल्डिंग भरभरा जाएगी ।’
   ‘हाँ, यह बात तो हमने सोचा ही नहीं था । चोरलैंड को भी ईमानदार लोगों की जरूरत होगी ।’
   ‘बेशक, पर उनको हमरी शर्तों पर रहना होगा । सत्ता के क्षेत्र में उनका प्रवेश निषेध होगा । प्रवेश करने की कउनो कोशिश पर भी उनको मृत्यु-दंड देय होगा ।’
   बहुत खूब-बहुत खूब’ और तालियाँ बज उठी थीं चारों तरफ । शांत होते ही एक मंचासीन चोर ने अपनी जिज्ञासा प्रगट करते हुए पूछा, ‘मुल्क के लिए जमीन क्या प्राप्त हो गई है?’
   ‘हम जमीन काहे खोजें? यह हमरा मुल्क है । जाना तो सरकार को पड़ेगा । सत्ता बहुते दिन तक उन लोगन के हाथ में नहीं रहने वाली ।’
   फिर एक बार तालियों की गड़गड़ाहट से महासभा गूँज उठी थी । आयोजक भी प्रसन्नता से भर उठा । रुकने का इशारा करते हुए उसने अपनी बात को आगे बढ़ाया । वह बोला, ‘पर इसके लिए हम लोगन को बलिदान के लिए तैयार रहना पड़ेगा । हमका अपने-अपने स्वार्थों का बलिदान करना होगा । अपनी-अपनी महत्वाकांक्षाओं को हिंद महासागर की अतल गहराइयों में डुबाना होगा । किसी एक को अपना नेता चुनकर उसके अधीन काम करना होगा । एकता बहुते जरूरी है इस काम के लिए ।’
साभार-india today
   इतना सुनते ही चोर खदबदाने लगे थे । चोरों की फितरत एक साथ काम करने की होती, तो वे एक महा-कम्पनी में काम कर रहे होते । पर यहाँ अपने अस्तित्व का सवाल था । ना-नुकुर की गुंजाइश नहीं थी ।
   एकता के बाद हमका संसाधन की जरूरत पड़ेगी । वित्तीय संसाधन तो हम लोगन के पास अकूत है । मानव संसाधन को देखें, तो हमरी संख्या के आगे बहुते देश फेल हो जाएंगे । कहने का मतलब है कि हमरा चोरलैंड अब बहुते दूर नहीं है ।’ कुछ देर रुककर, ‘अब हम लोगन को एक नेता का चुनाव करना है । फिर चोरलैंड का महा-प्रस्ताव लाया जाएगा ।... तो हम खुद को नेता के रूप में प्रस्तावित करता हूँ ।’
   ‘हम क्या प्याज छीलने आए हैं यहाँ पर?’ अचानक मंच पर बैठे दो चोर एक साथ बोल उठे थे, ‘हम क्यों नहीं बन सकते नेता?’
   ‘ठीक है । भीड़ हाथ उठाए कि कउन केकरा पक्ष में है । फैसला उसी का मान्य होगा ।’ एक चोर ने बात को संभाला था ।
   भीड़ का बहुमत आयोजक के पक्ष में खड़ा हो गया था । मन से या बे-मन से उसे नेता मान लिया गया । अगले कुछ पलों में चोरलैंड का महा-प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित भी हो गया । इसी के साथ महासभा के खत्म होने की घोषणा कर दी गई थी । अब सिर्फ सरकार को उखाड़ फेंकना ही शेष रह गया था । सभी सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए अपने-अपने रास्तों पर बढ़ गए थे ।

मंगलवार, 13 जून 2017

टॉपर उसको कहते हैं



बिन पढ़-लिख जो पास हो गया


धाकड़ उसको कहते हैं,


रिजल्ट आने पर जो जेल गया


टॉपर उसको कहते हैं ।


                                मसि-कागज को कभी न छूता


                                अपने भाग्य को मारे जूता,


                                जो तानकर सोए साल भर


                                टॉपर उसको कहते हैं ।


बाप खड़ा है बड़ा खिलाड़ी


नकल-वकल में रहे अगाड़ी,


ऐसे बाप का श्रवण कुमार जो


टॉपर उसको कहते हैं ।




                                  पढ़ना कोई काम नहीं है


                                 आराम कभी हराम नहीं है,


                                  जो ऐश में डुबकी मारे


                                  टॉपर उसको कहते हैं ।


गुरू गोविंद से कैसा नाता


हरदम मौज-मजा ही भाता,


जो टीचर को आँख दिखाए


टॉपर उसको कहते हैं ।


                                  परीक्षा नहीं, एक व्यापार है


                                 रुपयों-पैसों का भरा बाजार है,


                                  जो मुद्रा की खनक दिखाए


                                  टॉपर उसको कहते हैं ।


एक साधे सब सध जाए


कभी किसी के हाथ न आए,


जो भागे छापा पड़ने पर


टॉपर उसको कहते हैं ।


                             रिजल्ट से पहले मिष्टी का बँटना


                             मन में खुशी नहीं है अँटना,


                            ज्योतिषी-सा जो भाग्य भी बाँचे

                 

                            टॉपर उसको कहते हैं ।


बिन पढ़-लिख जो पास हो गया


धाकड़ उसको कहते हैं,


रिजल्ट आने पर जो जेल गया


टॉपर उसको कहते हैं ।

रविवार, 11 जून 2017

समाजवाद ने संन्यास ले लिया है

            


साभार - oneindia.com
   जो कभी अभूतपूर्व हुआ करते थे, वे अब भूतपूर्व हो चुके हैं । जिस समाजवादी स्टाइल में वे मोदक-मेवा के मनमोहक रसभोग उड़ाया करते थे, उस पर अब मुसीबतों की मार-ही-मार है । वे भी क्या दिन थे, जब समाजवाद की माला जपकर सब-कुछ को अपना बना लिया जाता था । समाजवाद ने बहुत कुछ दिया उन जैसे नेताओं को । मूँछ को समाजवादी घी लगाकर ऐंठते ही पहचान और मुस्कान के अनगिनत रास्ते खुल जाया करते थे । गुंडे, महागुंडे, परम गुंडे, चरम गुंडे, धरम गुंडे, बेशरम गुंडे, ज्ञानी गुंडे, अभिमानी गुंडे-सभी सम्मोहित होकर समाजवादी सैल्यूट ठोंकने लगते थे । पुलिस कहाँ जाने वाली थी ! उसके सामने बस दो ही विकल्प थे । या तो नेता गुंडों अथवा गुंडे नेताओं को सैल्यूट दो या फिर अपनी कनपटी पर उनके सैल्यूट की मार लो । एक चीज बहुत अच्छी हुआ करती थी । पुलिस के पास आराम था और गुंडों के पास काम । इस सैलूटा-सैलूटी के अलावा पुलिस आजाद थी सुखकारक समाजवादी नींद को उड़ाने के लिए ।
   इधर लालबत्ती की धमक और नेतागिरी की चमक चौंधियाती थी आम जन को, उधर उनके मन में समाजवाद जपना पराया माल अपना की प्यास उन्हें व्याकुल-पथ पर अग्रसर करती थी । लोग पीठ पीछे उन्हें ताने मारा करते थे । आम जन को अपने देश में यही एक मौलिक अधिकार हासिल है । ताने का उल्टा नेता ही होता है, इसीलिए वह तानों का बुरा नहीं मानता । यह ताने ही थे, जिनकी बदौलत वे नेता से घाघ नेता और इस तरह एक महान नेता बन सके ।
   महान नेता बनने के लिए कुछेक बेमिसाल गुणों का होना परम आवश्यक होता है । सबसे पहले तो उनके पास उच्च समाजवादी विचार थे । जिसका कोई नहीं होता, उसके समाजवादी होते हैं । यही समाजवादी विचारधारा उन्हें गुंडों का साथ देने और गुंडई करने के लिए उकसाती थी । पुलिस और गुंडों में समानता देख पाना केवल उनके ही नजरिए से सम्भव था । वैसे भी उच्च विचार ऐसे विभेदों को कहाँ मानता है ! पुलिस की तो कोई माई-बाप है, लेकिन गुंडे तो अनाथ हैं । एक अनाथ की पीठ पर अगर समाजवादी अपना हाथ न रखें, तो आप ही बताइए कि कौन रखेगा ।
   इसके साथ उनके पास चरित्र की महानता थी । कोई भी काम व्यक्तिगत स्वार्थ के अधीन होकर नहीं किया । बलात्कार हो या किसी की हत्या, लूट-खसोट हो या अपहरण-फिरौती-सब कुछ समाजवाद के लिए किया । यहाँ तक कि किन्हीं खास भैंसों को गुम कराना और उन्हें ढूँढने के लिए पुलिस को लगाने के पीछे भी एक समाजवादी मकसद ही था । बेटे को हीरो बनाना और बाप को जीरो बनाना भी समाजवादी हित के लिए किया गया । इस महान ऐतिहासिक घटना के दौरान उन्होंने भी अपने बाप को जमकर लानत-मलामत भेजा । गालियों का एक पूरा कंटेनर ही उस बाप के हवाले कर दिया ।
   लोग कहते हैं कि कानून और पुलिस के हाथ बहुत लम्बे होते हैं । पर समाजवाद का चमत्कार देखिए कि उसके सामने कानून बौना हो जाता है और पुलिस मौनी । ऐसे संकट की स्थिति में समाजवादी नेता आगे आता है और अपने हाथों को लम्बा करता है । इतना लम्बा करता है कि परती जमीन, ऊसर जमीन, उर्वर जमीन, रेल की जमीन, सरकार की जमीन, जलाशयों की जमीन, नदी-नालों की जमीन, बागों की जमीन, इधर की जमीन-उधर की जमीन-सब कुछ उसके हाथ की जद में आ जाते हैं । अपने अभूतपूर्व समय में उन्होंने भी जमकर अपने हाथों को लम्बा बनाया और कानून को हाथ लम्बा करने की अच्छी-खासी नसीहत दी ।
साभार - Puneet Agrawal
   उन दिनों का समय और आज का समय । आज घर में कदम रखते ही तूफान का सामना हो गया । पत्नी क्रोधायमान थी और प्रतिष्ठा की अग्नि में धू-धूकर जल रही थी । तूफान को थामने की गरज से उन्होंने पूछा, ‘अरे क्या हुआ भागवान, क्यों आसमान को हिलाने पर तुली हुई है?’
   ‘आज तो आसमान हिलकर रहेगा ।’ पत्नी ने चीखते हुए जवाब दिया, ‘सुना तुमने, पड़ोसियों की ऐसी मजाल हो गई कि हमारे पप्पू को पीट दिया । अभी निकलो घर से और उन नामुरादों पर ऐसा बान मारो कि...उनकी लात का जवाब अपने लात से दो ।’
   ‘नहीं कर सकता भागवान ।’ उन्होंने समाजवादी दर्द को पीने की कोशिश करते हुए कहा, ‘उस समय लातों की केवल आउटगोइंग हुआ करती थी, पर अब समय बदल गया है । आउटगोइंग भेजा, तो उधर से लातों की इनकमिंग हो जाएगी...वह भी फ्री में ।’ कहने के साथ ही उनका शरीर तो शरीर, रुह तक काँपने लगी थी ।
   ‘और हमारे भाई का क्या,’ पत्नी ने एक और गुस्से को आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘अपनी मेहनत को वह यूँ ही सस्ते में छोड़ दे? उन जवाहरबागों की जमीन कोई कैसे वापस ले सकता है? उसकी अब तक रक्षा करने वाली पुलिस कहाँ है आखिर?’
   एक और दर्द जाग उठा जैसे सीने में । बेवफा से क्या उम्मीद की जाए आखिर । बुरे वक्त में तो परछाईं भी साथ छोड़ जाती है । पुलिस काम पर लौट आई है । वह अब हमारी क्यों सुनेगी भला !
   पुलिस के काम पर लौटने का मतलब ही है कि समाजवाद ने संन्यास ले लिया है । अब उसके संन्यास को तोड़ने के लिए उसी आम जन से चिरौरी ही एकमात्र रास्ता है, जिससे उसके नाम पर छल किया गया ।

रविवार, 4 जून 2017

पप्पू भइया की जीत किधर है

चित्र साभार- Cosmo Times
   आज रोज जैसा नजारा नहीं है किले के बाहर । हमेशा मंथर गति से चलने वाला निकटतम आस-पास का परिवेश आज कुछ गतिमान है । न केवल कुछ ज्यादा लोग चले आए हैं, बल्कि अभी भी चले आ रहे हैं । दोपहर होते-होते अर्द्ध-निद्रा को प्राप्त हो जाने वाले टिकट-क्लर्क अभी भी मुस्तैदी से डटे हुए हैं और टिकट-वितरण कर रहे हैं । उधर गाइड अपनी-अपनी जानकारियों को सिरे से सँजो रहे हैं, ताकि बेहतर प्रस्तुति की जा सके । किला तो आँखों में है, लेकिन उसके इतिहास को कुछ ऐसे बताया जाए कि वह भी आँखों के प्रत्यक्ष सामने दिखाई दे । किले के अहाते से सटे दुकानदार अपनी पुरानी चीजों को नया बनाने के लिए उन्हें चमकाने की जुगत में लगे हुए हैं ।
   अचानक किले के बाहर कुछ झंडे दिखाई देने लगे थे । सच्चा, अच्छा और चमचा कार्यकर्ता वही होता है, जो अपने नेता की आहट को दूर से पहचान ले । नेता गुपचुप आए, पर ऐसे कार्यकर्ताओं के लिए तो सारे सूचना-उपग्रह एक साथ जाग उठते हैं । वातावरण में गर्मी पहले से विद्यमान थी और इनकी उपस्थिति ने उसे और बढ़ाना शुरु कर दिया था । पर्यटकों को अब भरोसा होने लगा था कि मजमा अच्छा जमेगा आज । तभी तीन-चार चमचमाती गाड़ियों की एक कतार किले के निकट सरकती दिखाई दी । अरे यह क्या, कभी खुद को अभूतपूर्व मानने वाले पप्पू भइया हैं यह तो ! चेहरे का नूर हो चुका है काफूर । रुतबा और शानो-शौकत भी उनके भूतपूर्व हो चुके हैं, ठीक उन्हीं की तरह । दो-चार सुरक्षा-गार्ड हैं साथ में । इसके अलावा पत्नी और बच्चे ।
   दो-चार खास आदमियों को अपने लेकर पप्पू भइया तेजी से किले के अंदर चले गए । उनके आने की सूचना पर किले का प्रशासन तो अलर्ट था ही, अब कुछ और अलर्ट हो गया । मैं भी चौकन्ना हो गया था । आखिर तो भइया अपनी पर आ ही गए । कभी जनता की नजरों से छिपाकर मौज करने वाले आज यूँ मस्ती के मूड में हैं । कुछ काम-धन्धा तो अब रहा नहीं, ऐसे में मौज-मस्ती ही बड़ा सहारा होती है । मैं लपका उनके पीछे । कैमरामैन मेरे पीछे । कुछ-एक फोटो उनके मिल जाए, तो मजा आ जाए । लोगों को चैनलों पर दिखाए जा रहे ऐसे फोटो बहुत पसंद आते हैं । एक गाइड के सपोर्ट से मैं सीधे पप्पू भइया तक जा पहुँचा । वह उस बड़े कमरे के एक कोने में कुछ ढूँढ रहे थे । जरूर किसी मस्ती की तलाश कर रहे होंगे-मैंने सोचा । फिर आगे बढ़कर पूछा, ‘कुछ खो गया लगता है आपका । मस्ती या किसी सुकून की तलाश तो...’
चित्र साभार- patrika.com
   मुझ पर नजर पड़ते ही पप्पू भइया ने अपने पलक-पाँवड़े बिछा दिए मेरी राहों में । कभी एक इंटरव्यू के लिए भाव खाने वाले आज मुझे टनों भाव दे रहे थे । समय सचमुच बहुत बलवान होता है । वह मेरे हाथ को अपने हाथों में लेते हुए बोले, ‘ठीक फरमाया आपने । परिवार के साथ मौज-मस्ती ट्रिप पर ही निकला हूँ, पर दिल में एक काँटा चुभा हुआ है । हम पहलवानों को शत्रुओं ने धूल चटा दी । इस दिल में उसी हार का काँटा है । आखिर वे जीत कैसे सकते हैं । हमारी जीत को उन लोगों ने छीन लिया है । हमें उसी जीत की तलाश है । जहाँ देखता हूँ, बस हार-ही-हार दिखती है । जीत कहीं दिखाई नहीं देती । जरूर शत्रुओं ने कहीं छिपा दिया है उसे ।’
   अब मुझे चौंकना और सतर्क होना ही चाहिए था । किले में तो लोग इतिहास को ढूँढने आते हैं । जीत भी तो इतिहास बन चुकी है पप्पू भइया के लिए ।...तो वे किसी सीक्रेट मिशन पर हैं । खुला खेल इलाहाबादी वाली बात नहीं है यहाँ पर । ‘क्या आप मेरी जीत को ढूँढने में मेरी मदद करेंगे?’ उनके स्वर में याचना का भाव था ।
   याचक को यूँ ही छोड़ देना शोभा नहीं देता । ‘क्यों नहीं, मगर उस जीत की कोई फोटो...’ मैंने उन्हें अपनी तरफ से राहत दान करते हुए कहा ।
   ‘अफसोस, वही नहीं है । वह मेरे सपने में कई बार आई थी, लेकिन तकनीकी गड़बड़ी के कारण उसका स्नैप-शॉट नहीं ले सका ।’ कहते-कहते उनका चेहरा मुरझा उठा था ।
   ‘तो अब आप उसे कहाँ खोजेंगे?’ मैंने उनकी भविष्य की योजनाओं में झाँकने की कोशिश करते हुए पूछा ।
चित्र साभार- economictimes.indiatimes.com
   ‘किलों के बाद राजमहलों और आलीशान बंगलों की बारी है । उसके बाद सभी गुप्त तहखानों-तिजोरियों को खंगालूँगा । हर बड़ी जगह पर मुझे दस्तक देना है ।’ उनके चेहरे से संकल्प के भाव बाहर आने को आतुर दिखे ।
   ‘पर श्रीमान, आप किसान के खेत-खलिहान, गरीब की झोपड़ी या किसी मेहनतकश मजदूर की रोटी-प्याज के बीच में उसे क्यों नहीं ढूँढते?’
   ‘हद करते हैं आप भी ।’ वह तनिक गुस्से में आते हुए बोले, ‘हमारी जीत की चोरी एक हाई-प्रोफाइल घटना है और आप उसे इन लो-प्रोफाइल जगहों पर...शत्रु इतना नासमझ भी नहीं है कि जीत को बिना सुरक्षा के छोड़ दे ।’
   ‘तो फिर एक जगह है मेरी निगाह में ।’ मैंने अपने दिमाग की नसों को संकुचित करते हुए कहा ।
   ‘हाँ, बताइए तो, इतनी देरी किस बात के लिए ।’ वह अधीरज हो उठे थे हमारी बात सुनते ही । वरना अभी पल भी कितना बीता था ।
   ‘स्विस बैंक या उसके जैसे दूसरे बैंक । उन सुरक्षित जगहों पर भी तलाश करनी चाहिए, जहाँ विजय माल्या या ललित मोदी जैसे लोग छिपे हुए हैं । वैसे अपने शत्रु देशों को भी निगाह में रखना चाहिए । आतंकवादियों के ठिकानों में भी ताक-झाँक उचित होगा ।’
   ‘ठीक कहा आपने । अब मुझे अपने परिवार के साथ विदेशी ट्रिप पर निकल जाना चाहिए । वहाँ के किलों को भी तो देखना है हमें ।’ और इतना कहते-कहते वे किसी जासूस की तरह अपने काम में लग गए थे । चलो अच्छा ही है । पाँच वर्ष का लम्बा वक्त काटने के लिए यह बहाना भी क्या बुरा है गालिब !

गुरुवार, 1 जून 2017

रात अभी बाकी है ( भाग-5 )


आँखों में है स्याही कैसी


कैसी मदिरा और साकी है,


अभी सांझ होने वाली है


पूरी रात अभी बाकी है ।


                                    आँखों में जादू उतरा है


                                    तन जैसे मय का प्याला,

                                    

                                     कितनी अब तक पी चुके


                                     यह खिंची हुई हाला ।


सच बतलाओ-कैसी मदिरा है


किस धरती पर खिंची हुई,


अब तक जो भी देखी मैंने


केवल मयखानों में सजी हुई ।


                                     पर जग को मरते देखा है


                                     तुममे तेज कहाँ से आया,


                                     एक अग्नि जलाती जग को


                                     दूजी आग कहाँ से पाया ।

    
                                                           जारी...

रविवार, 28 मई 2017

गरीब-गुरबा पर सीबीआई की रेड

                  

 
चित्र साभार- cariblah.wordpress.com
      अचानक जैसे ही टीवी चैनलों ने ब्रेकिंग न्यूज चलाना शुरू किया, मेरे कुछ पल के आराम को ब्रेक लग गया । ब्रेकिंग न्यूज आ रही थी कि चालू नेता के अलग-अलग ठिकानों पर सीबीआई की रेड हुई है । कई लोग यह समझने की भूल कर सकते हैं कि अगर नेता चालू है, तो यह तो होना ही था उसके साथ । मगर यह भूल स्वीकार नहीं । अरे भई, चाल-चरित्र से वह चालू है या नहीं, यह लेखा-जोखा तो उसके वोटर समझें । मैं तो इतना जानता हूँ कन्फर्म कि वह नाम से चालू है । वैसे भी अगर नाम से काम का गठजोड़ होता, तो कई दारोगा चोर नहीं बने होते और सिंकिया सिंह नामी पहलवान बन खम नहीं ठोंकते ।
      कैमरामैन को लेकर मैं तत्काल ही निकल पड़ा चालू नेता के आलीशान मकान की तरफ । नेताजी के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ रही थीं, पर हमें देखते ही वह हवा-हवाई हो गई । गिरगिट की तरह जो रंग नहीं बदल सकता, वह चालू के स्तर का नेता भी नहीं बन सकता । यहाँ तो हमारा सामना चालू नेता से ही था । कछु सूँघ लिया है का कि चप्पल रगड़ते चले आए हमरे आवास पर? अरे, हमका भी तो बतलाइए ।’ हवाई के स्थान पर अब नरमाई आ गई थी चेहरे पर उनके । वह हमें इशारा करते हुए अपने शानदार कान्फ्रेंस हॉल की ओर बढ़ गए ।
   अंदर पहुँचकर एक कुर्सी पर बैठते ही मैंने पूछा, ‘क्या सचमुच आपको नहीं पता कि आपके गुप्त ठिकानों पर सीबीआई की रेड हुई है?’
   ‘हम कछु नहीं जानते ।’ उन्होंने अपना चेहरा दूसरी तरफ करते हुए कहा, हम तो आपके मुँह से सुन रहे हैं । मगर यह रेड हुई किस बात के लिए है?’
   ‘आपके हजारों करोड़ की बेनामी संपत्ति को लेकर यह सब किया गया है । आरोप है कि आपने अपना काला धन भी जमके सफेद किया है ।’
   ‘का, इतना सब हो गया हमरे साथ !’ वह आश्चर्य के लिए आँखें चौड़ी करते हुए चीखकर बोले, ‘और हमको अब खबर हो रही है । इ तो सरासर धोखा है हमरे साथ । पिछली सरकार तो कछु करने से पहले हमरी अनुमति लिया करती थी । इ लोग हमको बिना बताए कर दिए । सचमुच अहंकारी सरकार है यह ।’
   ‘आप अपनी बेनामी संपत्तियों के बारे में क्या कहना चाहेंगे?’ मैंने इस पर उनकी राय जानने की कोशिश की ।
   ‘इ तो सरासर साजिश है हमरे खिलाफ । हम फासीवादी ताकतों के खिलाफ बोलता हूँ, एही लिए इ साजिश रची गई है । सरकार हमरा मुँह बंद करना चाहती है ।’
   ‘आपका मतलब है कि सरकार साजिश करके आपको संपत्तिवान बनाना चाहती है । वास्तव में आपके पास कोई संपत्ति नहीं है ।’
   ‘हाँ एतना ही नहीं,’ उन्होंने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा, ‘इ गरीब-गुरबा के ऊपर हमला है । हम गरीब-गुरबा का नेता हूँ । हम पर हमला... मतलब गरीब-गुरबा पर हमला ।’
   ‘यहाँ तो सीधे-सीधे आपके ऊपर रेड पड़ी है । गरीब कहाँ से आ गया बीच में?’ मैंने उनकी बात काटने की कोशिश करते हुए कहा ।
   ‘आप तो जबरजोरी किए जा रहे हैं ।’ उनके चेहरे पर क्रोध के भाव थे । वह तमतमाते हुए बोले, ‘आप तो हमरे और गरीब-गुरबा के बीच में दरार डालना चाहते हैं, पर हम बता देना चाहता हूँ कि कोई भी सफल नहीं होगा । हम गरीब-गुरबा का नेता था, हूँ और हमेशा रहूँगा ।’
   ‘चलिए, किसी भी एक गरीब का नाम बताइए, जिसकी आपने सेवा की हो और वह उसके बाद से गरीब नहीं रहा हो ।’ शायद मेरे शब्दों से चुनौती के भाव उभर आए थे ।
   ‘क्या कहा आपने?...गरीब नहीं रहा ! यही तो मंशा है सरकार की । वह चाहती है कि गरीब नहीं रहे । वह गरीबों को मारकर हमको मारना चाहती है । पर हम चालू हूँ । जब तक समोसे में आलू रहेगा, भरोसे में तब तक ये चालू रहेगा ।’
   ‘आप गरीब-गरीब करते हैं, नसीब-नसीब की भी तो बात करिए । कहाँ उनका नसीब और कहाँ आपका । उनका भोजन तो जगजाहिर है, पर आपके छप्पन भोग...’
चित्र साभार- twitter.com
   ‘इ तो एकदम्मे पोपट वाली बात हुई । कौन बनाया पत्रकार आपको?’ कुछ पल रुककर फिर बोले, ‘गरीब-गुरबा जिस-जिस व्यंजन के लिए लार टपकाता है, हम उसी-उसी व्यंजन को खाता हूँ । इ सुनकर उ लोग संतोष प्राप्त करता है । आज नेता खा रहा है, कल उ लोगन के नसीब होगा ।’
   इतना कहते हुए वे उठकर अपनी गोशाला की ओर बढ़ गए । हम लोग भी उनके पीछे-पीछे । वह एक गाय की पूँछ पकड़ते हुए बोले, ‘आपको सबूत चाहिए ना । हम गोबर की सौगंध खाकर कहता हूँ कि हमरा कोई सम्पत्ति नहीं । हम का करूँगा सम्पत्ति बनाकर । गरीब-गुरबा ही हमरा सम्पत्ति है ।’
   ‘मगर आप साबित क्या करना चाहते हैं गाय और गोबर से? जरा खुलके बताइए प्लीज ।’
   ‘गाय-गोबर से गरीब का नजदीकी नाता है और हमरा तो आप इ सब देख ही रहे हैं ।’ घूमते हुए कैमरे की नजर गाय के ऊपर पड़ते ही वह आगे बोले, ‘जिस प्रकार कोई कम्पनी होलोग्राम चिपकाती है अपने असली माल पर, उसी तरह गोबर और इ सानी-पानी हमरा होलोग्राम है । हम एक बार फिर कहता हूँ कि सरकार ने गरीब-गुरबा पर हमला किया है ।’

   हम सरकार का पक्ष जानने और सबूत की पड़ताल के लिए सीबीआई के दफ्तर का रुख करते हैं ।

रविवार, 21 मई 2017

चाँद की चिता ( भाग-4 )



मरु का-सा है सूखा आँगन


कैसे सावन की पड़ी फुहार है?


कुछ तुम ही बतलाओ राही


मेरे मन पर पड़ा तुषार है । 


                                   जिस  राह  तुम चलते जाते


                                   शूल  वहाँ  मुझे  दिखते  हैं,


                                   इस राह जाओ प्राणीअच्छे


                                   यही   राह  मुझे  लगते  हैं ।


चूता  तन  से  हाय  पसीना


जैसे मन से व्यथा छिटकती,


रात   भी   रोने   लगती   है


ज्यों चाँद की चिता है सजती ।


                                 एक  बूँद  चेहरे   पर  नाचे


                                 एक  बूँद  है  रज  में मरती,


                                 किसे कौन मिलता है आखिर


                                 एक  बूँद  है  मन  में डरती ।


कोई लौटा दे बीते हुए दिन


चित्र साभार - cartoon baotinforum.com
   पहलू-दर-पहलू बदलने के बाद भी मुझे नींद नहीं आई थी । अंततः बिस्तर छोड़कर कमरे से बाहर निकल आया था । इधर मेरे कदम तेज हुए थे, उधर तेज हवा का झोंका आकर टकराया था मेरे बदन से । अगले ही पल मैं पार्क में था । नींद आँखों में नहीं थी, लेकिन उसका आलस-तंत्र बरकरार था अब तक । फूलों से टकराकर आती हवा ने इस तंत्र को पलक झपकते ध्वस्त कर दिया । मैं एक बेंच की ओर बढ़ा । यह क्या, बेंच पर कोई पहले से ही मौजूद था । वह एकदम निकट आने पर ही नजरों में समाने लायक था । ऐसा होने के पीछे उस रोशनी का कुसूर था, जो उस जगह पर नहीं पहुँच रही थी ।
   थोड़ा और निकट आया, तो आश्चर्य कम झटका ज्यादा लगा । वहाँ मौजूद प्राणी और कोई नहीं, छाया बहिनजी थीं । उनका दावा था कि ईश्वर ने किसी और को नहीं, बल्कि केवल उन्हें भेजा है अपने लोगों पर शासन करने के लिए । अतः यह लोगों का दायित्व है कि वह उन्हें ही वोट देकर सत्ता तक पहुँचने में उनकी मदद करे । वह साक्षात ईश्वर की छाया हैं, अतः कम से कम अपने राज्य में सत्ता का सुख लूटने का ठेका भगवान ने केवल उन्हें ही प्रदान कर रखा है ।
   एक आश्चर्य और हुआ । बहिनजी तो मौजूद थीं, किन्तु छाया नदारद थी उनकी । अनगिनत छायाओं के आवरण में रहने वाली के पास इस वक्त कोई छाया नहीं थी । मुझे समझ में नहीं आया कि लानत-मलामत इस रोशनी की हठधर्मिता को भेजूँ या वक्त के तमाशे को । वह मुझे देखकर थोड़ी भयभीत-सी हुईं । कारण उनको घेरे रहने वाला सुरक्षा-दस्ता वहाँ नहीं था और सामने एक आम आदमी खड़ा था । वह चिल्लातीं, इसके पहले ही मैं पीछे हटते हुए बोला, 'आप सुरक्षित हैं, क्योंकि एक आम आदमी आपके साथ है ।'
   ' क्या खाक साथ है ।' वह पहले से ही तैयार बैठी थीं शायद, इसीलिए यह सुनते ही उबल पड़ीं । चीखते हुए बोलीं, 'वह साथ होता, तो आज मैं इस एकान्त में पड़ी होती? आज तो बिस्तर में मेरी नींद भी मेरे साथ नहीं है ।'
   मेरी नजर उनके बदन पर लदे सोने और हीरे पर जा फँसी थी । एक नजर उनकी जूतियों से भी रू--रू होकर चली आई थी । मुझे एहसास हुआ कि सोने आदमी के 'सोने' की गारंटी नहीं होते, अन्यथा बहिनजी अपने आलीशान बंगले में जबर्दस्त मुलायम बिस्तर पर इस वक्त नींद के मजे लूट रही होतीं । मुझे यह देखकर भी दुख का एहसास हुआ कि बदन के हीरे तो जुगनुओं की तरह चमक रहे थे, किन्तु उनके चेहरे की चमक गायब थी ।
   'मैं कुछ समझा नहीं ।' वास्तव में उनके मन की बात को पकड़ नहीं पाया था मैं । अतः बेंच के एक तरफ बैठते हुए मैंने पूछा, 'आप कहना क्या चाहती हैं?'
   'पिछले हर चुनाव में मुझे हार का मुँह देखना पड़ रहा है । मैं कुछ भी करती हूँ, लेकिन हार मेरे ही गले में आकर गिरती है । ऐसा क्यों होता है?'
   हार भी तो आपको बहुत पसंद है । वह नोटों का हार...आप रंग में होती थीं, आम आदमी दंग होता था । यह मेरे मुँह से निकलते-निकलते रह गया । उनके सुनते ही आपे से बाहर होने के पूरे आसार थे । रात के इस सन्नाटे में मैं कोई खतरा मोल नहीं ले सकता था । बहिनजी के सामने तो दिन में भी खतरा है । मैंने उन्हें राहत देने की नीयत से कहा, 'हो सकता है विपक्षियों ने आपके लोगों को भरमा दिया हो या वे लोग वोट के समय जागते-जागते रह गए हों ।'
   'एकदम नहीं । मुझे लगता है कि जिस हद तक उन्हें मूर्ख बनाना चाहिए था, उस हद तक मैं नहीं बना पाई । उन्हें बनाने की कोशिशों में कुछ कमी रह गई ।' कहते-कहते उनके चेहरे पर अफसोस के भाव उभर आए थे । अंदर उनके मन में एक अज्ञात भय भी समा रहा था कि कहीं मूर्ख बनाने के दिन लदने तो शुरु नहीं हो गए !
   'लोकतंत्र में बनाना...' मैंने मूर्ख सा मुँह खोलते हुए पूछा ।
   'बनाना पड़ता है, तभी सारे आम अपनी मुट्ठी में होते हैं । सत्ता को आम आदमी यूँ ही नहीं देता ।'
   उनकी बात मुझे नागवार गुजरी थी, क्योंकि मैं भी एक आम आदमी हूँ । लोग झूठ तो नहीं बोलते कि आम आदमी समझदार होता है और वह मूर्ख कतई नहीं बनता कभी-चाहे वह खुद कोशिश करे या कोई और उसे बनाए ।
   'आज तो यह है कि सत्ता दूर-दूर जा रही है, तो कुछ और भी पीछे छूट रहा है ।' मुझे चुप देख उन्होंने खुद ही बात आगे बढ़ाई थी । कुछ पल रुक कर बोलीं, 'आज संगी-साथी भी मेरा साथ छोड़ चले हैं । जिन्होंने मेरे आशीर्वाद से सत्ता की मलाई जम कर खाई, अब वह भी मीडिया में आँखें तरेरने लगे हैं ।'
   'यही माया है बहिनजी । मैं तो कहता हूँ कि निकल जाइए इस माया के जाल से । माया खुद जीती है, पर औरों को ठीक से जीने नहीं देती ।'
   'आपके कहने का मतलब कि मैं संन्यास ले लूँ? अपनी आज तक की मेहनतों को यूँ ही समर्पण कर दूँ? छाया को उससे', हाथ ऊपर उठाकर, 'आदेश मिला है कि वह अपने लोगों पर शासन करे । छाया उस आदेश की अवमानना नहीं कर सकती ।'
   'तो फिर इतने सालों तक प्रतीक्षा...एकान्त-राग भी आपको संन्यास की ओर ले जाएगा । आपके छोड़ चले साथी आपको इस ओर धकेलें, आप खुद ही...'
   'मैं समझी नहीं आपका मतलब?'
   'सीधा सा है ।' मैंने जवाब दिया, ' आप अपने बंगले को 'माया-आश्रम' नाम दे दीजिए । शेष आपके चेले-चपाटी कर देंगे । यहाँ किसी को मूर्ख बनाना नहीं पड़ता । लोग खुद ही मूर्ख बने चले आते हैं । वहाँ तो आम आदमी शीश झुकाता था, यहाँ तो सत्ता वाले भी झुकते हैं । यहाँ की सत्ता अधिक बलवान है, परन्तु मौन रहकर काम करती है ।'

   बहिनजी असमंजस में दिखाई पड़ती हैं । हालांकि अब उन्हें एहसास होने लगा है कि पुराने दिन अब नहीं लौटने वाले । कोई लौटा दे मेरे बीते हुए दिन की याचना करने से तो यही अच्छा है कि दूसरे विकल्प को चुन लिया जाए । कम से कम इज्जत तो बची रह जाएगी । वह मेरी पीठ पर हाथ रखती हैं और उठकर आगे बढ़ जाती हैं । मैं उधर उन्हें बढ़ते हुए देखता हूँ, इधर रात तेजी से आगे बढ़ती है ।        
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